Ek Nayee Geeta Likhu

 नई गीता ! 

नई गीता लिखूं

Ek Nayee Geeta Likhu 

Ek Nayee Geeta Likhu

सोचता हूँ, इक नई गीता लिखूं ! आधार है !!
हालात थे, जो तब, आज भी वैसा मेरा संसार है !

पर, कहाँ से कृष्ण लाऊँ,?
औ’ पितामह सा, कहाँ से तेज पाऊँ ?
हैं सभी जो पात्र तब, उनमे, अधिकतर,
आज भी मै, पात्र पाऊँ!
कौरवों की भीड़ तो, फ़ैली पडी है, इस जगत में;
पर कहाँ से पांडवों की शान पाऊँ?

युद्ध स्थल भी बनाना ही पड़ेगा, आधार है,
पात्र इतने बढ़ गए है, युद्ध –भू तैयार है !!
.............हालात थे, जो तब, आज भी वैसा मेरा संसार है !

द्रौपदी का चीर क्या था ? कुछ भी  नहीं था !!!
नित नए ही मिल रहे है-
आज, तो चिथड़े सड़क पर.
राजधानी या शहर हो,
या कोई, छोटा सा जनपद,
घूरती आँखों को लेकर,
सब खड़े हैं, हर सड़क पर.

कौरवों की दुष्टता, हर मोड़ पर है,
‘गलतियां होती है, बच्चों से,”
कहा जाता यहाँ पर !
दिख रहा, ध्रतराष्ट्र का प्रतिरूप देखो, है यहाँ पर;

क्यों न अब, गांडीव की टंकार गरजे,  आधार है !
............हालात तब के, आज भी हैं, ऐसा मेरा संसार है !

देखिये, ध्रतराष्ट्र जैसे पात्र,
बहुतेरे यहाँ पर,
मौन साधे; कह रहे,
“क़ानून, अपना काम करता ”
पर यहाँ क़ानून तो अंधा पडा है !!
हर जगह,
सौदों से ही तो राज चलता.
क्या कोई-
अपराध में रीता खड़ा है ?
शक्ति से, हुंकार से, सब काम चलता,

क्यूँ विदेशी आ गए हैं राज करने, क्यूँ यहाँ अंगार है. ?
चाटुकारों संग, घ्रणा फैलाने को सब तैयार है,.  
..........हालात तब के, आज भी हैं, ऐसा मेरा संसार है !

पुरुषोत्तम बाजपेयी.

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